एक और शुरुआत
धरती की गोद में
फिर एक कोंपल निकलना चाहती है
उसे नहीं मालूम कि कई घने पेड़
उसे धूप तक मयस्सर नहीं होने देंगे
ज़मीन की नमी को सोख लेंगे
मीलों तक जड़ों को फैलाकर
इलाके पर अपना वर्चस्व जताएंगे
फिर भी कोंपल जन्म लेना चाहती है
अपनी ज़मीन, अपना आसमान चाहती है
झाड़ और सूखे पत्तों के बीच कुछ बची नमी
और झुरमुटों के बीच से आती धूप से
एक दिन पेड़ बनने की ख़्वाहिश रखती है
कोंपल जो बड़ी होकर, लोगों को छांव देगी
जिस धरती से फूटी है, उसे टिकने का ठांव देगी
फलों-फूलों-सुगंध से जीवन का संचार देगी
परिंदों को घोंसला और हमें जीवन का सार देगी।


7 अप्रैल 2010 को 3:52 am बजे
good start... welcome in the world of blog
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